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ଶ୍ରୀ ରୂପ ଗୋସ୍ଵାମୀ ପ୍ରଣାମ  |
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ଶ୍ରୀ ଚୈତନ୍ଯମନୋଽଭୀଷ୍ଟଂ ସ୍ଥାପିତଂ ଯେନ ଭୂତଲେ।
ସ୍ଵଯଂ ରୂପଃ କଦା ମହ୍ଯଂ ଦଦାତି ସ୍ଵପଦାନ୍ତିକମ୍॥ |
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| हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ |
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