श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 8: शिष्यपरम्परा, माहात्म्य और उपसंहार  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  6.8.60 
नान्तोऽस्ति यस्य न च यस्य समुद्भवोऽस्ति
वृद्धिर्न यस्य परिणामविवर्जितस्य।
नापक्षयं च समुपैत्यविकारि वस्तु
यस्तं नतोऽस्मि पुरुषोत्तममीशमीडॺम्॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
मैं उन स्तुतियोग्य भगवान पुरुषोत्तम को नमस्कार करता हूँ, जो निष्फल हैं, जिनका न आदि है, न अन्त है, न वृद्धि है और न क्षय है तथा जो नित्य निर्विकार हैं ॥60॥
 
I bow to that praiseworthy Lord Purushottama, who is without any result and who has no beginning, no end, no growth and no decay and who is eternally without any change. ॥ 60॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)