यज्ञैर्यज्ञविदो यजन्ति सततं
यज्ञेश्वरं कर्मिणो
यं वै ब्रह्ममयं परावरमयं
ध्यायन्ति च ज्ञानिन:।
यं सञ्चिन्त्य न जायते न म्रियते
नो वर्द्धते हीयते
नैवासन्न च सद्भवत्यति तत:
किं वा हरे: श्रूयताम्॥ ५८॥
अनुवाद
जो यज्ञ में निपुण और कर्मनिष्ठ हैं, वे यज्ञेश्वर रूप में उन्हीं को भजते हैं, जिनका ध्यान बुद्धिमान लोग परब्रह्म मानकर करते हैं, जिनका स्मरण करने से मनुष्य न तो जन्म लेता है, न मरता है, न बढ़ता है, न घटता है, तथा जो न सत् (कारण) हैं और न अत् (कार्य) हैं, उनके विषय में श्रीहरि के अतिरिक्त और क्या सुना जा सकता है?॥58॥
Those who are experts in Yagyas and devoted to Karma worship Him in the form of Yajnaeshwar, whom the wise people meditate upon as the supreme Brahma, by remembering whom a man is neither born nor dies, neither grows nor diminishes, and who is neither real (cause) nor unreal (effect), what else can be heard about except Shri Hari? ॥58॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥