श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 8: शिष्यपरम्परा, माहात्म्य और उपसंहार  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  6.8.56 
यत्रादौ भगवांश्चराचरगुरु-
र्मध्ये तथान्ते च स:
ब्रह्मज्ञानमयोऽच्युतोऽखिलजग-
न्मध्यान्तसर्गप्रभु:।
तत्सर्वं पुरुष: पवित्रममलं
शृण्वन्पठन्वाचय-
न्प्राप्नोत्यस्ति न तत्फलं त्रिभुवने-
ष्वेकान्तसिद्धिर्हरि:॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
जिसके आदि, मध्य और अन्त में सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने में समर्थ ब्रह्मज्ञान से युक्त चराचर गुरु भगवान अच्युत का ही जप किया गया है। उस परम उत्तम और व्यावहारिक पुराण के श्रवण, पठन और धारण करने से जो फल प्राप्त होता है, वह सम्पूर्ण त्रिलोकी में अन्यत्र कहीं भी प्राप्त नहीं हो सकता, क्योंकि मोक्ष रूपी सिद्धियाँ देने वाले भगवान विष्णु ही उसके एकमात्र फल हैं। 56॥
 
In the beginning, in the middle and in the end of which only the Brahmagyan-empowered Charachar Guru Lord Achyut, who is capable of creation, creation and destruction of the entire world, has been chanted. The result that is obtained by listening, reading and imbibing that supremely good and practical Purana cannot be obtained anywhere else in the entire Triloki, because only Lord Vishnu, who gives Siddhis in the form of liberation, is the only result of it. 56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)