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श्लोक 6.7.28  |
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:।
बन्धाय विषयासङ्गि मुक्त्यै निर्विषयं मन:॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है; विषयों का संग करने से वह बंधनकारक हो जाता है और विषयों से रहित होने से वह मुक्तिकारक हो जाता है॥28॥ |
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| The mind alone is the cause of man's bondage and liberation; by associating with sense-objects it becomes binding and by being devoid of sense-objects it becomes liberating.॥ 28॥ |
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