श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 6: केशिध्वज और खाण्डिक्यकी कथा  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  6.6.37-38 
पूजिताश्च द्विजास्सर्वे सदस्या मानिता मया।
तथैवार्थिजनोऽप्यर्थैर्योजितोऽभिमतैर्मया॥ ३७॥
यथार्हमस्य लोकस्य मया सर्वं विचेष्टितम्।
अनिष्पन्नक्रियं चेतस्तथापि मम किं यथा॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
मैंने सम्पूर्ण ब्राह्मणों और ऋत्विजों का पूजन किया, समस्त गणों का आदर किया, भिखारियों को उनकी इच्छानुसार दान दिया, सामाजिक रीति से अपेक्षित समस्त कर्तव्य पूरे किए, परन्तु न जाने क्यों मेरे मन में कुछ क्रियाओं का अभाव अनुभव हो रहा है?॥ 37-38॥
 
"I worshipped all the Brahmins and Ritwijs, respected all the members, gave the beggars whatever they desired, did all the duties that were required according to social customs, but I don't know why my mind is feeling the absence of some activity?"॥ 37-38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)