श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 5: आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान् के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  6.5.87 
संज्ञायते येन तदस्तदोषं
शुद्धं परं निर्मलमेकरूपम्।
संदृश्यते वाप्यवगम्यते वा
तज्ज्ञानमज्ञानमतोऽन्यदुक्तम्॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
जिससे निर्दोष, शुद्ध, निष्कलंक और एक परमात्मा को देखा या जाना जाता है, उसे परा विद्या कहते हैं और जो इसके विपरीत है, उसे अपरा विद्या कहते हैं। ॥87॥
 
That by which the blameless, pure, unblemished and one Supreme Being is seen or known is called knowledge (Para Vidya) and that which is contrary to this is called ignorance (Apara Vidya). ॥ 87॥
 
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेंऽशे पञ्चमोऽध्याय:॥ ५॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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