श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 5: आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान् के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  6.5.82 
भूतेषु वसते सोऽन्तर्वसन्त्यत्र च तानि यत्।
धाता विधाता जगतां वासुदेवस्तत: प्रभु:॥ ८२॥
 
 
अनुवाद
भगवान् सभी प्राणियों में विद्यमान हैं और सभी प्राणी उनमें निवास करते हैं। वे जगत के रचयिता और रक्षक हैं, इसलिए उन्हें 'वासुदेव' कहा जाता है।
 
The Lord is present in all beings and all beings also reside in Him. He is the creator and protector of the universe; therefore He is called 'Vasudev'.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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