श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 5: आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान् के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन  »  श्लोक 66-68
 
 
श्लोक  6.5.66-68 
यत्तदव्यक्तमजरमचिन्त्यमजमव्ययम्।
अनिर्देश्यमरूपं च पाणिपादाद्यसंयुतम्॥ ६६॥
विभुं सर्वगतं नित्यं भूतयोनिरकारणम्।
व्याप्यव्याप्तं यत: सर्वं यद्वै पश्यन्ति सूरय:॥ ६७॥
तद‍्ब्रह्म तत्परं धाम तद्धॺेयं मोक्षकाङ्क्षिभि:।
श्रुतिवाक्योदितं सूक्ष्मं तद्विष्णो: परमं पदम्॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
जो अव्यक्त, अविनाशी, अचिन्त्य, अज, अविकारी, अविकारी, निराकार, पाणिपादिशून्य, व्यापक, सर्वव्यापी, सनातन, भूतों का मूल कारण, स्वयं अकारण तथा जिससे सर्वव्यापक और सर्वान्तर्यामी प्रकट हुआ है और जिसे पंडित लोग [ज्ञानरूपी नेत्रों से] देखते हैं, वही परमधाम है, मुमुक्षुओं को उसका ध्यान करना चाहिए और वही वेदों से प्रतिपादित भगवान विष्णु का अत्यंत सूक्ष्म परमपद है। 66-68॥
 
The unmanifested, immortal, unthinkable, aja, invariable, undirected, formless, pani-padadishunya, comprehensive, omnipresent, eternal, the original cause of the ghosts, causeless in itself and from which the all-pervading and all-pervasive has manifested and which the pundits see [with the eyes of knowledge] is the supreme abode itself, the Mumukshus should meditate on it and the same is the very subtle supreme position of Lord Vishnu as propounded from the Vedas. Is. 66-68॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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