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श्लोक 6.5.65  |
द्वे वै विद्ये वेदितव्ये इति चाथर्वणी श्रुति:।
परया त्वक्षरप्राप्तिर्ऋग्वेदादिमयापरा॥ ६५॥ |
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| अनुवाद |
| अथर्ववेद कहता है कि ज्ञान दो प्रकार का है - परा और अपरा। परसे अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति होती है और अपरा ऋगादि वेदत्रयी रूप है। 65॥ |
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| Atharva Veda says that there are two types of knowledge – Para and Apara. Parase Akshar Brahma is attained and Apara Rigadi is Vedatrayi form. 65॥ |
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