श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 5: आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान् के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  6.5.51 
पुनश्च गर्भे भवति जायते च पुन: पुन:।
गर्भे विलीयते भूयो जायमानोऽस्तमेति वै॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
[स्वर्ग या नरक भोगकर] वह बार-बार गर्भ में आकर जन्म लेता है और फिर कभी गर्भ में ही नष्ट हो जाता है और कभी जन्म लेते ही मर जाता है ॥ 51॥
 
[After experiencing hell or heaven] again and again he comes into the womb and takes birth and then sometimes he perishes in the womb itself and sometimes he dies immediately after taking birth. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)