श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 5: आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान् के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  6.5.41 
निरुद्धकण्ठो दोषौघैरुदानश्वासपीडित:।
तापेन महता व्याप्तस्तृषा चार्त्तस्तथा क्षुधा॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
फिर धीरे-धीरे दोषों के संचय से उसका कंठ रुँध जाता है; और वह गुड़गुड़ाने लगता है; तथा भारी श्वासों से व्याकुल होकर तथा तीव्र ताप से व्याप्त होकर वह भूख-प्यास से व्याकुल हो जाता है ॥ 41॥
 
Then gradually, his throat becomes clogged with the accumulation of defects; and he begins to make gurgling sounds; and, troubled by breathing heavily and being pervaded by intense heat, he becomes restless with hunger and thirst. ॥ 41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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