श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 5: आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान् के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  6.5.34 
प्रक्षीणाखिलशौचश्च विहाराहारसस्पृह:।
हास्य: परिजनस्यापि निर्विण्णाशेषबान्धव:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
उसकी समस्त शुद्धि-वृत्ति नष्ट हो जाती है और भोग-विलास तथा भोजन की लालसा बढ़ जाती है; उसके परिवार के लोग भी उस पर हँसते हैं और उसके मित्र भी उससे उदासीन हो जाते हैं ॥ 34॥
 
All his cleanliness habits are destroyed and his craving for enjoyment and food increases; his family members also laugh at him and his friends become indifferent to him. ॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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