श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 5: आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान् के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  6.5.28 
दूरप्रणष्टनयनो व्योमान्तर्गततारक:।
नासाविवरनिर्यातलोमपुञ्जश्चलद्वपु:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
उसकी दृष्टि दूर की वस्तुओं को देखने में असमर्थ हो जाती है, नेत्रों के तारे कोटर में धँस जाते हैं, नासिका से बहुत से बाल निकल आते हैं और शरीर काँपने लगता है॥28॥
 
His sight becomes incapable of perceiving distant objects, the stars of the eyes sink into the sockets, many hairs come out of the nostrils and the body begins to tremble.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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