श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 5: आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान् के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  6.5.19 
अशुचिप्रस्तरे सुप्त: कीटदंशादिभिस्तथा।
भक्ष्यमाणोऽपि नैवेषां समर्थो विनिवारणे॥ १९॥
 
 
अनुवाद
वह अशुद्ध (मूत्र-विष्ठा से सना हुआ) बिस्तर पर लेटा रहता है और उस समय कीड़े-मकोड़े उसे काटते हैं, परन्तु वह उन्हें भगाने में असमर्थ होता है ॥19॥
 
He lies on an impure bed (stained with urine and feces), and at that time insects and flies bite him, but he is incapable of driving them away. ॥19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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