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श्लोक 6.5.18  |
कण्डूयनेऽपि चाशक्त: परिवर्तेऽप्यनीश्वर:।
स्नानपानादिकाहारमप्याप्नोति परेच्छया॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| उसमें खुजलाने या करवट बदलने की भी शक्ति नहीं रहती। स्नान और दूध पीने आदि आहार भी वह दूसरों के कहने पर ही ग्रहण करता है॥18॥ |
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| He does not even have the strength to scratch himself or turn over. He even gets food like bathing and drinking milk etc. at the behest of others.॥ 18॥ |
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