श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 5: आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान् के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  6.5.18 
कण्डूयनेऽपि चाशक्त: परिवर्तेऽप्यनीश्वर:।
स्नानपानादिकाहारमप्याप्नोति परेच्छया॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उसमें खुजलाने या करवट बदलने की भी शक्ति नहीं रहती। स्नान और दूध पीने आदि आहार भी वह दूसरों के कहने पर ही ग्रहण करता है॥18॥
 
He does not even have the strength to scratch himself or turn over. He even gets food like bathing and drinking milk etc. at the behest of others.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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