श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 5: आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान् के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  6.5.16 
मूर्च्छामवाप्य महतीं संस्पृष्टो बाह्यवायुना।
विज्ञानभ्रंशमाप्नोति जातश्च मुनिसत्तम॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे मुनिश्रेष्ठ! जन्म लेने के पश्चात् जीवात्मा बाह्य वायु के स्पर्श से अत्यंत क्षीण होकर अचेत हो जाता है ॥16॥
 
O best of sages! After being born, the soul becomes extremely faint due to the contact of external air and becomes unconscious. ॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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