न सन्ति यत्र सर्वेशे नामजात्यादिकल्पना:।
सत्तामात्रात्मके ज्ञेये ज्ञानात्मन्यात्मन: परे॥ ३७॥
तद्ब्रह्म परमं धाम परमात्मा स चेश्वर:।
स विष्णुस्सर्वमेवेदं यतो नावर्तते यति:॥ ३८॥
अनुवाद
जो ज्ञानस्वरूप परमात्मा और जानने योग्य परमेश्वर है, जो आत्मा से पृथक (देहादिसंगत) है और जिसे नाम, जाति आदि का कोई भेद नहीं है, वही सबके परम आश्रय परमात्मा है और वही ईश्वर है। विष्णु ही सम्पूर्ण जगत् के रूप में स्थित हैं। उनको प्राप्त होकर योगीजन पुनः इस संसार में नहीं लौटते। 37-38॥
The Supreme Soul of knowledge and knowable God, who is separate from the soul (Dehadisanghat) and has no idea of name, caste etc., He is the ultimate shelter of all, the Supreme Soul and He is God. It is Vishnu who is situated in the form of the entire world. After attaining him, Yogis do not return to this world again. 37-38॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥