श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 4: प्राकृत प्रलयका वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  6.4.33 
आकाशं चैव भूतादिर्ग्रसते तं तथा महान्।
महान्तमेभिस्सहितं प्रकृतिर्ग्रसते द्विज॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
हे द्विज! मूल प्रकृति आकाश की सत्ता (तामस अहंकार), सत्ता की महत्ता और इन सबकी महत्ता को अपने में समाहित कर लेती है। 33॥
 
Hey Dwija! The original nature absorbs into itself the existence of the sky (Tamas ego), the importance of the existence and the importance of all these. 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)