श्री विष्णु पुराण  »  अंश 6: षष्ठ अंश  »  अध्याय 1: कलिधर्मनिरूपण  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  6.1.10 
वर्णाश्रमाचारवती प्रवृत्तिर्न कलौ नृणाम्।
न सामऋग्यजुर्धर्मविनिष्पादनहैतुकी॥ १०॥
 
 
अनुवाद
कलियुग में मनुष्यों का स्वभाव न तो वर्णाश्रम-धर्म के अनुकूल है और न ही ऋक्-साम-यजुरूप त्रि-धर्म की पूर्ति के अनुकूल है ॥10॥
 
In Kaliyuga, the nature of human beings is not in accordance with Varnashrama-Dharma nor is it conducive to the fulfillment of the Tri-Dharma of Rik-Sama-Yajurup. 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)