श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 7: कालिय-दमन  »  श्लोक 79-80
 
 
श्लोक  5.7.79-80 
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वा सर्पराजं तं मुमोच भगवान‍्हरि:।
प्रणम्य सोऽपि कृष्णाय जगाम पयसां निधिम्॥ ७९॥
पश्यतां सर्वभूतानां सभृत्यसुतबान्धव:।
समस्तभार्यासहित: परित्यज्य स्वकं ह्रदम्॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
श्री पराशर बोले - सर्पराज कालिया से ऐसा कहकर भगवान श्रीहरि ने उसे छोड़ दिया और उसे प्रणाम करके वह सर्प समस्त प्राणियों के सामने ही अपने सेवकों, पुत्रों, सम्बन्धियों और पत्नियों सहित उस सरोवर को छोड़कर समुद्र में चला गया।
 
Shri Parashara said - Having said this to the King of Serpents Kaliya, Lord Hari released him and after paying his obeisance to him, the Serpent left that tank along with his servants, sons, relatives and wives in front of all creatures and went to the ocean. 79-80.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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