श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 7: कालिय-दमन  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  5.7.61 
कालिय उवाच
तवाष्टगुणमैश्वर्यं नाथ स्वाभाविकं परम्।
निरस्तातिशयं यस्य तस्य स्तोष्यामि किन्न्वहम्॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
कालियानाग ने कहा - हे नाथ! आपका स्वाभाविक आठ गुना विशेष परम ऐश्वर्य अनन्त है (अर्थात् आपसे बढ़कर किसी का ऐश्वर्य नहीं है), अतः मैं आपकी स्तुति किस प्रकार करूँ?॥ 61॥
 
Kalianag said - O Nath! Your natural eight-fold special supreme opulence is infinite [that is, no one's opulence is greater than yours], so how can I praise you?॥ 61॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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