श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 7: कालिय-दमन  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  5.7.51 
यतन्तो न विदुर्नित्यं यत्स्वरूपं हि योगिन:।
परमार्थमणोरल्पं स्थूलात्स्थूलं नता: स्म तम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
जिनके शाश्वत स्वरूप को योगीजन प्रयत्न करने पर भी नहीं जान पाते और जिनका परम स्वरूप अणु से भी सूक्ष्म और स्थूल से भी स्थूल है, उनको हम नमस्कार करते हैं॥51॥
 
We salute Him whose eternal form the yogis cannot know even after trying, and whose supreme form is smaller than the atom and grosser than the physical. 51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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