श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 7: कालिय-दमन  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  5.7.33-34 
श्रीपराशर उवाच
इति गोपीवच: श्रुत्वा रौहिणेयो महाबल:।
गोपांश्च त्रासविधुरान्विलोक्य स्तिमितेक्षणान्॥ ३३॥
नन्दं च दीनमत्यर्थं न्यस्तदृष्टिं सुतानने।
मूर्च्छाकुलां यशोदां च कृष्णमाहात्मसंज्ञया॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
श्री पराशरजी बोले - गोपियों के ऐसे वचन सुनकर और भयभीत नेत्रों से गोपियों को देखकर, अत्यन्त दीन नन्दजी को उनके पुत्र और मूर्छित यशोदा का मुख देखते हुए, महाबली रोहिणीनन्दन बलरामजी ने संकेत से कृष्णजी से कहा - 33-34॥
 
Shri Parasharji said - Hearing such words of the Gopis and seeing the Gopis with frightened eyes, the very poor Nandji looking at the face of their son and the unconscious Yashoda, the mighty Rohininandan Balramji in his signal said to Krishnaji - 33-34॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd