श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 7: कालिय-दमन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  5.7.30 
उत्फुल्लपङ्कजदलस्पष्टकान्तिविलोचनम्।
अपश्यन्त्यो हरिं दीना: कथं गोष्ठे भविष्यथ॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
हे! तुम व्रज में ऐसे दुःखी होकर, श्रीहरि के दर्शन किए बिना कैसे रह सकोगे, जिनके नेत्र खिले हुए कमलदलों के समान चमक रहे हैं?॥30॥
 
Oh! How will you be able to stay in Vraja, feeling so miserable, without seeing Sri Hari, whose eyes are radiant like the blooming lotus petals?॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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