श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 7: कालिय-दमन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  5.7.26 
गोप्य ऊचु:
सर्वा यशोदया सार्धं विशामोऽत्र महाह्रदम्।
सर्पराजस्य नो गन्तुमस्माभिर्युज्यते व्रजम्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
गोपियाँ बोलीं - अब हम भी यशोदा सहित सर्पराज के इस महान् कुण्ड में डूब रही हैं। अब हमारा व्रज में जाना उचित नहीं है॥ 26॥
 
The Gopis said - Now we too are drowning in this great pool of the King of Serpents along with Yashoda. It is not appropriate for us to go to Vraj now.॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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