श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 32: उषा-चरित्र  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.32.25 
दृष्टमात्रे तत: कान्ते प्रद्युम्नतनये द्विज।
दृष्ट्वात्यर्थविलासिन्या लज्जा क्वापि निराकृता॥ २५॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर ज्यों ही प्रद्युम्नत्नय ने अपने प्रियतम अनिरुद्धजी को देखा, त्यों ही उस परम विलासिनी स्त्री का लज्जा जाता रहा॥25॥
 
After that, as soon as Pradyumnatnay saw his beloved Aniruddhaji, the shyness of that very luxurious lady seemed to have gone away. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)