श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 30: पारिजात-हरण  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  5.30.46 
सामान्यस्सर्वलोकस्य यद्येषोऽमृतमन्थने।
समुत्पन्नस्तरु: कस्मादेको गृह्णाति वासव:॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
यदि वह अमृत-मंथन से उत्पन्न हुआ है, तो वह सबकी समान संपत्ति है। इन्द्र अकेला उसे कैसे ले सकता है?॥ 46॥
 
If it was produced during the churning of nectar, then it is the equal property of all. How can Indra alone take it?॥ 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)