vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री विष्णु पुराण
»
अंश 5: पंचम अंश
»
अध्याय 30: पारिजात-हरण
»
श्लोक 46
श्लोक
5.30.46
सामान्यस्सर्वलोकस्य यद्येषोऽमृतमन्थने।
समुत्पन्नस्तरु: कस्मादेको गृह्णाति वासव:॥ ४६॥
अनुवाद
यदि वह अमृत-मंथन से उत्पन्न हुआ है, तो वह सबकी समान संपत्ति है। इन्द्र अकेला उसे कैसे ले सकता है?॥ 46॥
If it was produced during the churning of nectar, then it is the equal property of all. How can Indra alone take it?॥ 46॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×