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श्री विष्णु पुराण
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अंश 5: पंचम अंश
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अध्याय 30: पारिजात-हरण
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श्लोक 42
श्लोक
5.30.42
देवराजो मुखप्रेक्षी यस्यास्तस्या: परिग्रहम्।
मौढॺात्प्रार्थयसे क्षेमी गृहीत्वैनं हि को व्रजेत्॥ ४२॥
अनुवाद
तू मूर्खतापूर्वक इस पारिजात को, उस शची के धन को चाहता है, जिसका मुख देवताओं के राजा भी देखते रहते हैं; इसे लेकर कौन सुरक्षित जा सकता है?॥ 42॥
You foolishly desire this Paarijaat, the wealth of that Shachi, whose face even the king of gods keeps looking at; who can go safely with this?॥ 42॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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