त्वं कर्ता च विकर्ता च संहर्ता प्रभवोऽप्यय:।
जगतां त्वं जगद्रूप: स्तूयतेऽच्युत किं तव॥ २६॥
अनुवाद
हे अच्युत! आप ही इस जगत के रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं; आप ही इसकी उत्पत्ति और प्रलय के स्थान हैं; आप ही जगत के स्वरूप हैं। फिर हम आपकी स्तुति किस प्रकार करें?॥26॥
O Achyuta! You are the creator, the nurturer and the destroyer of this universe; you are the place of its origin and its dissolution; you are the form of the universe. Then how should we praise you?॥26॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥