श्लोक 1: श्री पराशरजी बोले - विदर्भ क्षेत्र के अंतर्गत कुण्डिनपुर नामक नगर में भीष्मक नाम के एक राजा थे। उनके रुक्मी नाम का एक पुत्र और रुक्मिणी नाम की एक सुन्दर पुत्री थी। 1॥
श्लोक 2: श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी को और चारुहासिनी रुक्मिणी ने श्रीकृष्णचन्द्र को चाहा, परन्तु भगवान श्रीकृष्णचन्द्र से प्रार्थना करने पर भी उनके प्रति द्वेष के कारण रुक्मिणी ने उन्हें रुक्मिणी नहीं दी॥2॥
श्लोक 3: जरासंध की प्रेरणा से महाबली भीष्म ने रुक्मी की बात मान ली और रुक्मिणी को शिशुपाल को देने का निश्चय कर लिया ॥3॥
श्लोक 4: तब शिशुपाल के हितैषी, जरासन्ध और सब राजा विवाह में सम्मिलित होने के लिए भीष्मक की नगरी में गए॥4॥
श्लोक 5: इधर चेदिराज का विवाह समारोह देखने के लिए बलभद्र तथा अन्य यदुवंशियों सहित श्रीकृष्णचन्द्र भी कुण्डिनपुर आये। 5॥
श्लोक 6: तत्पश्चात, जब विवाह में केवल एक दिन शेष रह गया, तो श्री हरि ने उस कन्या का हरण कर लिया तथा अपने विरोधियों का भार बलभद्र आदि अपने भाइयों को सौंप दिया।
श्लोक 7-8: तब श्री पौण्ड्रक, दन्तवक्त्र, विदूरथ, शिशुपाल, जरासंध और शाल्व आदि राजाओं ने क्रोधित होकर श्री हरि को मारने का महान प्रयत्न किया, किन्तु बलराम आदि यदुश्रेष्ठों का सामना करके वे सब-के-सब परास्त हो गए॥7-8॥
श्लोक 9: तब रुक्मी ने प्रतिज्ञा की कि ‘मैं युद्ध में कृष्ण को मारे बिना कुण्डिनपुर में प्रवेश नहीं करूँगा’ और कृष्ण को मारने के लिए उनका पीछा किया॥9॥
श्लोक 10: परन्तु श्रीकृष्ण ने अपनी लीला से उसकी हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना को नष्ट कर दिया और उसे परास्त करके पृथ्वी पर गिरा दिया॥10॥
श्लोक 11: इस प्रकार युद्ध में रुक्मी को हराकर श्री मधुसूदन ने राक्षस से विवाहित रुक्मिणी से उचित (वैदिक) रीति से विवाह किया ॥11॥
श्लोक 12: उससे कामदेव के अंश से उत्पन्न हुए वीर प्रद्युम्न उत्पन्न हुए, जिनका शम्बरासुर ने हरण कर लिया था और जिन्होंने कालान्तर में शम्बरासुर का वध कर दिया॥12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥