श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 24: मुचुकुन्दका तपस्याके लिये प्रस्थान और बलरामजीकी व्रजयात्रा  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  5.24.6-7 
कृष्णोऽपि घातयित्वारिमुपायेन हि तद‍्बलम्।
जग्राह मथुरामेत्य हस्त्यश्वस्यन्दनोज्ज्वलम्॥ ६॥
आनीय चोग्रसेनाय द्वारवत्यां न्यवेदयत्।
पराभिभवनिश्शङ्कं बभूव च यदो: कुलम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार कृष्णचन्द्र ने बड़ी कुशलता से शत्रुओं का नाश किया और फिर मथुरा आकर उसकी हाथी, घोड़े और रथ आदि से सुसज्जित सेना को वश में कर लिया और द्वारका में लाकर राजा उग्रसेन को सौंप दिया। तब से यदुवंश शत्रुओं के भय से मुक्त हो गया। 6-7।
 
In this manner, Krishnachandra destroyed the enemy with great skill and then came to Mathura and subdued his army, which was adorned with elephants, horses and chariots etc. and brought it to Dwaraka and handed it over to King Ugrasen. Since then, the Yadu dynasty became free from the fear of the enemies. 6-7.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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