श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 24: मुचुकुन्दका तपस्याके लिये प्रस्थान और बलरामजीकी व्रजयात्रा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.24.2 
श्रीभगवानुवाच
यथाभिवाञ्छितान्दिव्यान्गच्छ लोकान्नराधिप।
अव्याहतपरैश्वर्यो मत्प्रसादोपबृंहित:॥ २॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान बोले - हे नरेश्वर! तुम अपनी इच्छा के अनुसार दिव्य लोकों में जाओ; मेरी कृपा से तुम्हें असीम ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी॥2॥
 
Shri Bhagwan said – O Nareshwar! You go to the divine worlds according to your opinion; By my grace you will attain unlimited opulence. 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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