श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 24: मुचुकुन्दका तपस्याके लिये प्रस्थान और बलरामजीकी व्रजयात्रा  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  5.24.13 
अस्मच्चेष्टामपहसन्न कच्चित्पुरयोषिताम्।
सौभाग्यमानमधिकं करोति क्षणसौहृद:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
क्या वह नन्दनन्दन अपने क्षणिक स्नेह से हमारे पुरुषार्थ का उपहास नहीं करता और नगर की स्त्रियों का सौभाग्य नहीं बढ़ाता?॥13॥
 
Does not that Nandanandan, with his momentary affection, ridicule our efforts and enhance the good fortune of the women of the city?॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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