राज्यमुर्वी बलं कोशो मित्रपक्षस्तथात्मजा:।
भार्या भृत्यजनो ये च शब्दाद्या विषया: प्रभो॥ ४०॥
सुखबुद्धॺा मया सर्वं गृहीतमिदमव्ययम्।
परिणामे तदेवेश तापात्मकमभून्मम॥ ४१॥
अनुवाद
हे प्रभु! राज्य, पृथ्वी, सेना, कोष, मित्र, पुत्र, स्त्री और सेवक आदि समस्त वस्तुओं को मैंने अविनाशी और सुख-बुद्धियुक्त मानकर ग्रहण किया था; परंतु हे प्रभु! परिणामतः वह दुःखी मनुष्य सिद्ध हुआ॥40-41॥
Oh, Lord! The kingdom, the earth, the army, the treasury, the friends, the sons, the wife and the servants, and all the things like words, I had adopted as imperishable and happy-intellectual; But O God! As a result, he proved to be a sad person. 40-41॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥