श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 22: जरासन्धकी पराजय  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  5.22.15 
मनसैव जगत्सृष्टिं संहारं च करोति य:।
तस्यारिपक्षक्षपणे कियानुद्यमविस्तर:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जो अपनी इच्छा मात्र से जगत् की रचना और संहार कर सकता है, उसे अपने शत्रुओं का नाश करने के लिए कितना प्रयत्न करना पड़ता है? ॥15॥
 
He who can create and destroy the world with just a will, how much effort do he have to make to destroy his enemies? ॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)