श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 18: भगवान् का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  5.18.57 
विश्वं भवान‍्सृजति सूर्यगभस्तिरूपो
विश्वेश ते गुणमयोऽयमत: प्रपञ्च:।
रूपं परं सदिति वाचकमक्षरं य-
ज्ज्ञानात्मने सदसते प्रणतोऽस्मि तस्मै॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
हे विश्वेश! आप सूर्य की किरणों के रूप में [वर्षा द्वारा] जगत् की रचना करने वाले हैं। अतः गुणों से युक्त यह जगत् आपका ही स्वरूप है। 'ॐ' अक्षर जो 'सत्' शब्द से निरूपित होता है ['ॐ तत् सत्' के रूप में] आपका ही परम स्वरूप है। आपके उस ज्ञानवान आत्मा, सद्-सत् स्वरूप को नमस्कार है। ॥57॥
 
O Vishvesha! You are the one who creates the world [by rain] in the form of the rays of the Sun. Therefore, this world of qualities is your form. The syllable 'Om' which is represented by the word 'Sat' [in the form of 'Om Tat, Sat'] is your ultimate form. Salutations to that knowledgeable soul of yours, Sad-Sat form. ॥ 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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