| श्री विष्णु पुराण » अंश 5: पंचम अंश » अध्याय 18: भगवान् का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह » श्लोक 55 |
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| | | | श्लोक 5.18.55  | सर्वार्थास्त्वमज विकल्पनाभिरेतै-
र्देवाद्यैर्भवति हि यैरनन्त विश्वम्।
विश्वात्मा त्वमिति विकारहीनमेत-
त्सर्वस्मिन्न हि भवतोऽस्ति किञ्चिदन्यत्॥ ५५॥ | | | | | | अनुवाद | | हे अर्जुन! जिन देवताओं आदि कल्पित पदार्थों से अनन्त ब्रह्माण्ड की रचना हुई है, वे सब आप ही हैं और आप ही अपरिवर्तनशील आत्मा हैं, अतः आप ही ब्रह्माण्ड के स्वरूप हैं। हे प्रभु! इन सब वस्तुओं में आपसे भिन्न कुछ भी नहीं है ॥ 55॥ | | | | O Arjuna! The gods and other imaginary things from which the infinite universe has been created are all You and You are the changeless Self, hence You are the form of the universe. O Lord! There is nothing different from You in all these things. ॥ 55॥ | | ✨ ai-generated | | |
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