श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 18: भगवान् का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  5.18.47 
ततो विज्ञातसद्भावस्स तु दानपतिस्तदा।
तुष्टाव सर्वविज्ञानमयमच्युतमीश्वरम्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
तब दानपति अक्रूरजी वास्तविक रहस्य जानकर उन सर्वज्ञ, अच्युत भगवान् की स्तुति करने लगे॥47॥
 
Then Daanpati Akrurji, after knowing the real secret, started praising that omniscient, infallible God. 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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