श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 18: भगवान् का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  5.18.20 
किं न वेत्ति नृशंसोऽयमनुरागपरं जनम्।
येनैवमक्ष्णोराह्लादं नयत्यन्यत्र नो हरिम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
क्या इस क्रूर और निर्दयी व्यक्ति को अपने प्रशंसकों की भावनाओं का ज़रा भी ज्ञान नहीं है कि वह हमारे प्रिय पुत्र नन्दनन्दन को इस प्रकार ले जाता है?
 
Does this cruel and ruthless person not know the feelings of his admirers at all that he takes our beloved son Nandanandan away in this manner?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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