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श्लोक 5.18.20  |
किं न वेत्ति नृशंसोऽयमनुरागपरं जनम्।
येनैवमक्ष्णोराह्लादं नयत्यन्यत्र नो हरिम्॥ २०॥ |
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| अनुवाद |
| क्या इस क्रूर और निर्दयी व्यक्ति को अपने प्रशंसकों की भावनाओं का ज़रा भी ज्ञान नहीं है कि वह हमारे प्रिय पुत्र नन्दनन्दन को इस प्रकार ले जाता है? |
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| Does this cruel and ruthless person not know the feelings of his admirers at all that he takes our beloved son Nandanandan away in this manner? |
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