श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 18: भगवान् का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  5.18.17-18 
भावगर्भस्मितं वाक्यं विलासललिता गति:।
नागरीणामतीवैतत्कटाक्षेक्षितमेव च॥ १७॥
ग्राम्यो हरिरयं तासां विलासनिगडैर्युत:।
भवतीनां पुन: पार्श्वं कया युक्त्या समेष्यति॥ १८॥
 
 
अनुवाद
नगर की स्त्रियाँ स्वभावतः ही अधिक हँसती हुई, कामुक वाणी, चंचल चाल और व्यंग्यात्मक दृष्टि वाली होती हैं। उनके विषय-बन्धन में बँधकर यह ग्राम हरि तुम्हारे पास कैसे आएगा?॥17-18॥
 
The women of the city naturally have more of a smiling, sensuous speech, a playful gait and a sarcastic glance. Having been bound by their sensual ties, how will this village Hari come to you [us]?॥17-18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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