श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 18: भगवान् का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.18.16 
सारं समस्तगोष्ठस्य विधिना हरता हरिम्।
प्रहृतं गोपयोषित्सु निर्घृणेन दुरात्मना॥ १६॥
 
 
अनुवाद
आज उस निर्दयी, दुष्ट बुद्धि वाले विधाता ने समस्त व्रज के सार (सर्वव्यापी) श्रीहरि को छीनकर हम गोपनारियों पर घोर आघात किया है।
 
Today the ruthless, evil-minded Creator has dealt a severe blow to us, the Gopnaaris, by taking away Shri Hari, the essence (all-encompassing) of all Vraja. 16.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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