श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 18: भगवान् का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.18.11 
श्रीपराशर उवाच
समादिश्य ततो गोपानक्रूरोऽपि च केशव:।
सुष्वाप बलभद्रश्च नन्दगोपगृहे तत:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
श्री पराशरजी बोले - तत्पश्चात अक्रूरजी, श्रीकृष्णचन्द्र और बलरामजी सब गोपों को जिनकी आज्ञा सुनाकर नन्दगोप के घर में सो गए॥11॥
 
Shri Parasharji said - After that Akrurji, Shri Krishnachandra and Balramji heard whose order to all the Gopas and slept in Nandagop's house. 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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