श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 18: भगवान् का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.18.1 
श्रीपराशर उवाच
चिन्तयन्निति गोविन्दमुपगम्य स यादव:।
अक्रूरोऽस्मीति चरणौ ननाम शिरसा हरे:॥ १॥
 
 
अनुवाद
श्री पराशर जी बोले - हे मैत्रेय! ऐसा विचार करते हुए यदुवंशी अक्रूर जी श्री गोविन्द के पास पहुँचे और उनके चरणों में सिर नवाकर 'मैं अक्रूर हूँ' कहकर उन्हें प्रणाम किया।
 
Shri Parashar Ji said - O Maitreya! Thinking in this manner, Akrur Ji of the Yaduvanshi dynasty reached near Shri Govind and bowed his head at his feet and saluted him saying 'I am Akrur'.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd