श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 10: शरद‍्वर्णन तथा गोवर्धनकी पूजा  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  5.10.34 
श्रूयन्ते गिरयश्चैव वनेऽस्मिन्कामरूपिण:।
तत्तद्रूपं समास्थाय रमन्ते स्वेषु सानुषु॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
"ऐसा सुना जाता है कि इस वन के पर्वत कामरूप हैं (वे अपनी इच्छानुसार कोई भी रूप धारण कर सकते हैं)। वे अपनी-अपनी चोटियों पर इच्छित रूप धारण करके क्रीड़ा करते हैं ॥ 34॥
 
"It is heard that the mountains of this forest are in the form of Kaam (they can take any form as per their wish). They play on their respective peaks by assuming the desired form. ॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)