श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 10: शरद‍्वर्णन तथा गोवर्धनकी पूजा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.10.2 
अवापुस्तापमत्यर्थं शफर्य: पल्वलोदके।
पुत्रक्षेत्रादिसक्तेन ममत्वेन यथा गृही॥ २॥
 
 
अनुवाद
जैसे गृहस्थ अपने पुत्र और भूमि के मोह से व्याकुल हो जाता है, वैसे ही मछलियाँ गड्ढों के जल में अत्यन्त तड़पने लगीं॥2॥
 
Just as a householder gets distressed due to attachment to his children and land, similarly the fishes started getting extremely hot in the water of the pits.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)