श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 2: इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र  »  श्लोक 125
 
 
श्लोक  4.2.125 
अहं चरिष्यामि तदात्मनोऽर्थे
परिग्रहग्राहगृहीतबुद्धि:।
यदा हि भूय: परिहीनदोषो
जनस्य दु:खैर्भविता न दु:खी॥ १२५॥
 
 
अनुवाद
मेरी बुद्धि को मदरूपी मगरमच्छ ने पकड़ लिया है। इस समय मैं ऐसा उपाय करूँगा कि विकारों से मुक्त होकर अपने कुटुम्बियों के दुःखों से दुःखी न होऊँगा ॥125॥
 
The crocodile of possessions has captured my intellect. At this time I will take such measures that after becoming free from vices I will not be saddened by the sufferings of my family members. ॥125॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)