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vishnu 4.2.124: संगति से विरक्ति ही तपस्वियों को मुक्त कर सकती है, संगति से ही सब दोष उत्पन्न होते हैं। योग में पारंगत तपस्वी भी संगति के कारण पतित हो जाते हैं, फिर मंदबुद्धि मनुष्यों का क्या होगा?॥124॥   |   vishnu अध्याय 4.2: इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र   ।   vishnu अंश 4: चतुर्थ अंश   ।   श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 2: इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र  »  श्लोक 124
 
 
श्लोक  4.2.124 
निस्सङ्गता मुक्तिपदं यतीनां
सङ्गादशेषा: प्रभवन्ति दोषा:।
आरूढयोगो विनिपात्यतेऽध-
स्सङ्गेन योगी किमुताल्पबुद्धि:॥ १२४॥
 
 
अनुवाद
संगति से विरक्ति ही तपस्वियों को मुक्त कर सकती है, संगति से ही सब दोष उत्पन्न होते हैं। योग में पारंगत तपस्वी भी संगति के कारण पतित हो जाते हैं, फिर मंदबुद्धि मनुष्यों का क्या होगा?॥124॥
 
Only detachment from company can liberate ascetics, all faults arise from association. Even ascetics who are well-trained in yoga fall down because of association, then what about people with slow intellect?॥124॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)