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श्लोक 4.15.45-46  |
तिस्र: कोटॺस्सहस्राणामष्टाशीतिशतानि च।
कुमाराणां गृहाचार्याश्चापयोगेषु ये रता:॥ ४५॥
संख्यानं यादवानां क: करिष्यति महात्मनाम्।
यत्रायुतानामयुतलक्षेणास्ते सदाहुक:॥ ४६॥ |
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| अनुवाद |
| जो गृहाचार्य यादवपुत्रों को धनुर्विद्या सिखाने के लिए सदैव तत्पर रहते थे, उनकी संख्या तीन करोड़ अट्ठासी लाख थी। फिर उन श्रेष्ठ यादवों की गणना कौन कर सकता है? जहाँ यदुराज उग्रसेन सदैव हजारों और लाखों की संख्या में रहते थे ॥ 45-46॥ |
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| The number of those Grihacharyas who were always ready to teach archery to the sons of Yadavas was three crores eighty eight lakhs. Then who can count those great Yadavas? Where Yaduraj Ugrasen always lived in thousands and lakhs. ॥ 45-46॥ |
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