श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 13: सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  4.13.35 
अनागच्छति तस्मिन्प्रसेने कृष्णो मणिरत्नमभिलषितवान‍्स च प्राप्तवान‍्नूनमेतदस्य कर्मेत्यखिल एव यदुलोक: परस्परं कर्णाकर्ण्यकथयत्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
जब प्रसेन वापस नहीं आया, तब सब यादव आपस में कानाफूसी करने लगे कि, "कृष्ण इस मणि को लेना चाहते थे; उन्होंने ही इसे लिया होगा - यह अवश्य उनका ही कार्य है।" ॥35॥
 
When Prasena did not return, all the Yadavas began to whisper among themselves, "Krishna wanted to take this precious stone; he must have taken it - this is definitely his doing." ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)